शनिवार, 15 जुलाई 2017

आज तो मैंने अपना यह ब्लॉग पुनर्लेखन के लिए फिर से चालू किया है। अब सोच रहा हूं कि अपने इस ब्लॉग पर रोज ही कुछ-न-कुछ लिखूंगा। 

मंगलवार, 12 मई 2015

विचार बहती हुई नदी के समान होते हैं | जैसे बहती हुई जलधारा अत्यंत निर्मल होती है , ठीक वैसे ही जो विचार निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं , वे बिलकुल निर्मल होते हैं | पोखर का जमा हुआ पानी गन्दा हो जाता है पर बहती हुई जलधारा कभी गन्दी नहीं होती |